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गाय के गोबर-पराली से बनी ‘गोमय समिधा’ को पेटेंट:हर साल बचेंगे 2 करोड़ पेड़, 90 लाख टन कार्बन डाई ऑक्साइड गैस उत्सर्जन रुकेगा
विज्ञान
5 नवंबर 2026

गाय के गोबर-पराली से बनी ‘गोमय समिधा’ को पेटेंट:हर साल बचेंगे 2 करोड़ पेड़, 90 लाख टन कार्बन डाई ऑक्साइड गैस उत्सर्जन रुकेगा

सनातन संस्कृति में गाय को सर्वदेवमयी और गोमय को पवित्रतम माना गया है। अब उसी गोमय ने आधुनिक विज्ञान के साथ मिलकर देश की दो सबसे बड़ी पर्यावरणीय समस्याओं पराली का धुआं और श्मशान में पेड़ों की कटाई का स्थायी समाधान खोज निकाला है। कोरोना त्रासदी के दौरान जब लकड़ियों के अभाव में नदियों में शव बहाए जाने के विचलित करने वाले दृश्य सामने आए थे, तब जयपुर के डॉ. सीताराम गुप्ता और अदिति गुप्ता ने देसी गाय के गोबर, पराली और वैदिक हवन सामग्री के सम्मिश्रण से लकड़ी का जैविक विकल्प तैयार किया, जिसे नाम दिया गया ‘गोमय समिधा’। इस नवाचार के प्रोडक्ट और प्रोसेस दोनों को अब आधिकारिक तौर पर राष्ट्रीय पेटेंट मिल गया है। यह तकनीक देश में प्रतिवर्ष अंतिम संस्कार के लिए कटने वाले करीब 2 करोड़ पेड़ों को बचाने और 90 लाख टन जहरीली कार्बन डाईऑक्साइड गैस के उत्सर्जन को रोकने में मील का पत्थर साबित होगी। आस्था + आधुनिक विज्ञान = नेट जीरो मोक्षधाम धार्मिक परंपराओं को विज्ञान से जोड़ते हुए इस अभियान को अब भारत सरकार के प्रतिष्ठित वैज्ञानिक संस्थान नीरी (सीएसआईआर-नीरी, नागपुर) का साथ मिला है। लैब से श्मशान तक- इस तरह मिली सिद्धि यह पेटेंट केवल किसी उत्पाद का नहीं, बल्कि सनातन गो-सेवा और आधुनिक विज्ञान के मिलन की जीत है। जब आस्था पर्यावरण की रक्षा का माध्यम बन जाए, तो समाज अपने आप सशक्त होता है। -डॉ. सीताराम गुप्ता, गोमय फाउंडर
ल
लता खण्डेलवाल
5 नवंबर 2026
#dainikbhaskar
लेख सारांश

सनातन संस्कृति में गाय को सर्वदेवमयी और गोमय को पवित्रतम माना गया है। अब उसी गोमय ने आधुनिक विज्ञान के साथ मिलकर देश की दो सबसे बड़ी पर्यावरणीय समस्याओं पराली का धुआं और श्मशान में पेड़ों की कटाई का स्थायी समाधान खोज निकाला है। कोरोना त्रासदी के दौरान जब लकड़ियों के अभाव में नदियों में शव बहाए जाने के विचलित करने वाले दृश्य सामने आए थे, तब जयपुर के डॉ. सीताराम गुप्ता और अदिति गुप्ता ने देसी गाय के गोबर, पराली और वैदिक हवन सामग्री के सम्मिश्रण से लकड़ी का जैविक विकल्प तैयार किया, जिसे नाम दिया गया ‘गोमय समिधा’। इस नवाचार के प्रोडक्ट और प्रोसेस दोनों को अब आधिकारिक तौर पर राष्ट्रीय पेटेंट मिल गया है। यह तकनीक देश में प्रतिवर्ष अंतिम संस्कार के लिए कटने वाले करीब 2 करोड़ पेड़ों को बचाने और 90 लाख टन जहरीली कार्बन डाईऑक्साइड गैस के उत्सर्जन को रोकने में मील का पत्थर साबित होगी। आस्था + आधुनिक विज्ञान = नेट जीरो मोक्षधाम धार्मिक परंपराओं को विज्ञान से जोड़ते हुए इस अभियान को अब भारत सरकार के प्रतिष्ठित वैज्ञानिक संस्थान नीरी (सीएसआईआर-नीरी, नागपुर) का साथ मिला है। लैब से श्मशान तक- इस तरह मिली सिद्धि यह पेटेंट केवल किसी उत्पाद का नहीं, बल्कि सनातन गो-सेवा और आधुनिक विज्ञान के मिलन की जीत है। जब आस्था पर्यावरण की रक्षा का माध्यम बन जाए, तो समाज अपने आप सशक्त होता है। -डॉ. सीताराम गुप्ता, गोमय फाउंडर

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