रामनगरी अयोध्या में सरायकेला छऊ का होगा शंखनाद भास्कर न्यूज| सरायकेला जिस अयोध्या की धरती पर दीपों की अनगिनत रोशनी के बीच प्रभु श्रीराम के स्वागत का उल्लास आसमान छूता है, उसी रामनगरी में इस बार झारखंड की सांस्कृतिक विरासत भी अपनी विशिष्ट पहचान का दीप जलाने जा रही है। सरायकेला की विश्वविख्यात छऊ नृत्य परंपरा जब अपनी लयबद्ध गतियों, आकर्षक शारीरिक मुद्राओं और भावपूर्ण नृत्याभिनय के साथ राममय वातावरण में उतरेगी, तो यह केवल नृत्य-प्रस्तुति नहीं होगी। यह कला, आस्था और सांस्कृतिक गौरव का अद्भुत संगम होगा। अयोध्या के भव्य दीपोत्सव में झारखंड के कलाकार प्रभु श्रीराम के दिव्य आगमन और उनके स्वागत में उमड़ते जन-उल्लास को छऊ की अनूठी शैली में जीवंत करेंगे। संगम परफॉर्मेंस आर्ट्स फाउंडेशन के तत्वावधान में होने वाली इस विशेष प्रस्तुति में दीपोत्सव की आध्यात्मिक अनुभूति, भक्ति, आनंद, सत्य, धर्म और मर्यादा के संदेश को नृत्य की भाषा में अभिव्यक्त किया जाएगा। पारंपरिक शारीरिक मुद्राओं, नियंत्रित देह-संचालन और लयात्मक गतियों के माध्यम से रामकथा के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक प्रसंगों को मंच पर साकार किया जाएगा। इस प्रस्तुति की परिकल्पना, निर्देशन और नृत्य-संयोजन में गुरु गणेश कुमार परिछा, गुरु शिवचरण साहू और गुरु रजतेंदु रथ का मार्गदर्शन रहेगा। कलाकारों में गुरु रजतेंदु रथ, गुरु गणेश कुमार परिछा, कुस्मी पटनायक, निबरण महतो, कालीप्रसन्न सारंगी, विजय सरदार, बैसागु सरदार, सूर्य नारायण रथ, सुचित्रा रथ और गायत्री रथ सहित अन्य कलाकार शामिल होंगे। वहीं गोपालनंदु तांती, प्रफुल्ल नायक और पूर्णचंद्र सरदार पारंपरिक वाद्य-संगीत से प्रस्तुति को सुर और लय प्रदान करेंगे। सरायकेला छऊ अपनी विशिष्ट मुखौटा परंपरा, शारीरिक अनुशासन और कलात्मक भावाभिव्यक्ति के लिए अंतरराष्ट्रीय पहचान रखता है। वर्ष 2010 में यूनेस्को ने छऊ को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया था। अयोध्या के इस प्रतिष्ठित सांस्कृतिक मंच पर सरायकेला छऊ की उपस्थिति झारखंड की कला-संपदा को राष्ट्रीय पहचान देने की दिशा में महत्वपूर्ण होगी। यह वह अवसर होगा, जब सरायकेला की मिट्टी में रची-बसी कला रामनगरी की भक्ति के साथ कदमताल करेगी। दीपों के उत्सव में झारखंड की सांस्कृतिक विरासत अपनी अलग रोशनी बिखेरेगी।
रामनगरी अयोध्या में सरायकेला छऊ का होगा शंखनाद भास्कर न्यूज| सरायकेला जिस अयोध्या की धरती पर दीपों की अनगिनत रोशनी के बीच प्रभु श्रीराम के स्वागत का उल्लास आसमान छूता है, उसी रामनगरी में इस बार झारखंड की सांस्कृतिक विरासत भी अपनी विशिष्ट पहचान का दीप जलाने जा रही है। सरायकेला की विश्वविख्यात छऊ नृत्य परंपरा जब अपनी लयबद्ध गतियों, आकर्षक शारीरिक मुद्राओं और भावपूर्ण नृत्याभिनय के साथ राममय वातावरण में उतरेगी, तो यह केवल नृत्य-प्रस्तुति नहीं होगी। यह कला, आस्था और सांस्कृतिक गौरव का अद्भुत संगम होगा। अयोध्या के भव्य दीपोत्सव में झारखंड के कलाकार प्रभु श्रीराम के दिव्य आगमन और उनके स्वागत में उमड़ते जन-उल्लास को छऊ की अनूठी शैली में जीवंत करेंगे। संगम परफॉर्मेंस आर्ट्स फाउंडेशन के तत्वावधान में होने वाली इस विशेष प्रस्तुति में दीपोत्सव की आध्यात्मिक अनुभूति, भक्ति, आनंद, सत्य, धर्म और मर्यादा के संदेश को नृत्य की भाषा में अभिव्यक्त किया जाएगा। पारंपरिक शारीरिक मुद्राओं, नियंत्रित देह-संचालन और लयात्मक गतियों के माध्यम से रामकथा के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक प्रसंगों को मंच पर साकार किया जाएगा। इस प्रस्तुति की परिकल्पना, निर्देशन और नृत्य-संयोजन में गुरु गणेश कुमार परिछा, गुरु शिवचरण साहू और गुरु रजतेंदु रथ का मार्गदर्शन रहेगा। कलाकारों में गुरु रजतेंदु रथ, गुरु गणेश कुमार परिछा, कुस्मी पटनायक, निबरण महतो, कालीप्रसन्न सारंगी, विजय सरदार, बैसागु सरदार, सूर्य नारायण रथ, सुचित्रा रथ और गायत्री रथ सहित अन्य कलाकार शामिल होंगे। वहीं गोपालनंदु तांती, प्रफुल्ल नायक और पूर्णचंद्र सरदार पारंपरिक वाद्य-संगीत से प्रस्तुति को सुर और लय प्रदान करेंगे। सरायकेला छऊ अपनी विशिष्ट मुखौटा परंपरा, शारीरिक अनुशासन और कलात्मक भावाभिव्यक्ति के लिए अंतरराष्ट्रीय पहचान रखता है। वर्ष 2010 में यूनेस्को ने छऊ को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया था। अयोध्या के इस प्रतिष्ठित सांस्कृतिक मंच पर सरायकेला छऊ की उपस्थिति झारखंड की कला-संपदा को राष्ट्रीय पहचान देने की दिशा में महत्वपूर्ण होगी। यह वह अवसर होगा, जब सरायकेला की मिट्टी में रची-बसी कला रामनगरी की भक्ति के साथ कदमताल करेगी। दीपों के उत्सव में झारखंड की सांस्कृतिक विरासत अपनी अलग रोशनी बिखेरेगी।
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